मोटर गाड़ी की गड़गड़हट से सुबह की ख़ामोशी में आज फिर ख़लल पड़ा। ऐसा अक्सर होता है। धनंजय बाबू काम के सिलसिले में ज़्यादातर घर के बाहर ही रहते हैं । कभी महीने के २० दिन तो कभी पूरा महीना। और इस बार तो महीने भर से भी ज़्यादा हुआ होगा। कारोबार भी तो फैला हुआ है। क्या करते हैं ? अजी एक काम हो तो बताऊँ। और रुपया-पैसा ? हम जैसों की गणित से ज़्यादा ही होगा। बस एक ही चिंता है.... बीबी जी की बीमारी। घर में दाख़िल होते ही धनंजय बाबू ने सबसे पहला सवाल भी यही किया "प्रतिमा कैसी है ?" जवाब मिला "जी वैसी ही, साहब कोई दूसरा डाक्टर ..."नौकरानी ने हिचकिचाते हुए कहा। चाय का प्याला सुड़कते हुए धनंजय बाबू ने कहा " हम्म्म देखता हूँ " इस बात को ६ महीने हो चुके हैं, बात भी एकदम आम हो चुकी है। जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं। पहले-पहल तो सब रिश्ते-नातेदार दौड़ पड़ते थे एकदम से। हाल-चाल लेने वाले भी रोज़ उमड़ आते थे। जाने क्या हो गया है ? ये किस बीमारी ने जकड़ लिया है प्रतिमा को !! न मुस्कुराती है, न कुछ कहती है। न रोती है, न कोई दर्द। न कोई वहम।...