बकौल मियां जी "अफ़साना के जन्नत नशीं होने के बाद अब जी नहीं लगता।" और कोई उनका हमउम्र दोस्त हैरत से अगर मियां जी से पूछ बैठे "जी नहीं लगता मतलब?" तो बस कहने लगते हैं "जी नहीं लगता मतलब, यहाँ इस घर में, हर कोना कुछ खाली सा महसूस होता है। पूरी दुनिया खाली सी मालूम होती है।" आज अफ्शा बेगम का इंतक़ाल हुए पूरा महीना गुज़र गया मगर मियां जी खाना तो दूर ठीक से पानी भी नहीं पीते। यहीं कमरे में पड़े रहते हैं। उनकी बेगम ख़ुशक़िस्मत रहीं होंगी जो शौहर की गोद में आख़िरी साँस भरी। बड़ी ख़ुश मिजाज़ थीं, हरदिल अज़ीज़। कभी कोई शिकायत नहीं, न किसी का बुरा चाहा। हमेशा मियां जी की ख़िदमत करती रहीं। मियां जी को किसी ने कभी रोते न देखा होगा मगर उस दिन फूट फूट के रो पड़े। मानो देखने वाले का कलेजा ही निकल जाये। वैसे तो मियां जी ६० के पार हैं। बालों पर ख़िजाब का शौक बड़ा था मगर अब इन सब कामों में भी दिल नहीं लगता। अक़्सर पान से सुर्ख़ लाल होंठ अब सूखे पत्तो से मुरझाये रहते हैं और अफ्शा बेगम के जाने के बाद मायूस चेहरे पर झुर्रियों ने अपना घर सा बना लिया हो जैसे। हों भी क्यों न, वक़्त कम भी कहाँ...