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कविता - 'बचपन की बातें ' (Poem: Bachpan Ki Baatein)


मदारी का खेल...कच्चे आम

और बचपन की बातें

पीपल की बड़ी-बड़ी शाख़ें

और न जाने कितनी ही तारे गिनते बीती रातें

       वो गरजते बादल

       और  बरसात के दिन

       धुली  धरती, धुले पत्ते

       भीगते हुए छाते के बिन

       वो सड़को पे दौड़ लगाना

       गर्मी की दोपहर में माँ को नींद से जगाना

       फिर फ़रमाइशें करना

       और मनवाना

     याद है न

मदारी का खेल...कच्चे आम

       और बचपन की बातें

       वो पुराने अख़बार से बना जहाज़

      जिसने कच्चे हौसलों को भी दी कभी परवाज़ 

       वो खेलके पसीने में नहाना

       गेंद के पैसों के लिए कॉपी का बहाना

       वो यारों का उसका नाम लेके चिढ़ाना

      अच्छा तो लगना पर फिर झूठा सा मुँह बनाना

 हाँ याद है...

मदारी का खेल...कच्चे आम

       और बचपन की बातें

      अक्सर जामुन से रंगे होंठ

      और बर्फ़ के गोले से ठण्डे गाल

      बीतें हैं वो लम्हें, बीत गए वो साल

      वो मदारी का खेल...कच्चे आम

     और बचपन की बातें

      जाने कहाँ गयीं वो तारे गिनते बीती रातें  !!

- मनीष विश्वास 

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