समय बीता, बोर्ड परीक्षा के परिणाम घोषित हुए और अंग्रेजी में मैंने अपनी कक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त किये (और मैं इस तथ्य को भूल गया कि मैं अपनी कक्षा में काना था) मेरे मान की कोई सीमा न रही। सच कहूँ तो ये गर्व की भावना सर्वथा आधारहीन न थी। मेरी अंग्रेजी का स्तर दिन-प्रतिदिन पाताल से सतह पर आ रहा था (गणितीय भाषा का स्तेमाल करें तो स्थिति साफ़ हो जाती है, from - to 0 level) परमेश्वर के आशीर्वाद से मेरा चयन लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि ऑनर्स (पंचवर्षीय पाठ्यक्रम) के लिए हुआ। ऐसा कहा जाता है की विधि की पढाई अंग्रेजी माध्यम के बिना व्यर्थ है, परिणाम स्वरुप मैंने अंग्रेजी में विधि की पढाई करने का निश्चय किया। ऐसा करने में जिस गर्व की भावना को मैं महसूस कर रहा था वह अवर्णनीय है।
मैं इस अतीत की स्मृति का एक-एक अंश भुला देना चाहता था कि मैं भी कभी हिंदी माध्यम का छात्र हुआ करता था। उस समय मैं हिंदी भाषा का अंध समर्थक हुआ करता था और अंग्रेजी भाषा में अपनी अक्षमता या यूँ कहें कि अपने inferiority complex को छिपाने के लिए मैं चतुर्दिशों से हिंदी का समर्थन किया करता था और अपनी बात को पुख़्ता करने के लिए हिंदी प्रेम को देश प्रेम तक खींच कर ले जाता था। मैं अंग्रेजी बनाम हिंदी के इस वाद-विवाद में जब भी शिरकत की विजय श्री मेरी ही हुई। उन हठी अंग्रेजी समर्थकों को पराजित करने के लिए मैं तरह-तरह के शस्त्रों का प्रयोग किया करता था। कभी उन्हें अंग्रेजों की छठी संतान कहकर तो कभी कुछ और कहकर उनका मान-मर्दन किया करता था। जब हारने लगता तो भारत सरकार की तरह बीच का रास्ता अपनाता और कहता-
"We have to learn English but not at the cost of Hindi."
और फिर भारतेन्दु हरिश्चंद की पंक्तियाँ मेरे ज्ञान को पोषित करतीं-
"निज भाषा उन्नति उहै, सब उन्नति के मूल।
बिनु निज भाषा ज्ञान कै, मिटै न हिय के सूल।।
परन्तु Law Honours में दाखिले के साथ ही मेरा सामना वास्तविक प्रतियोगी युग से हुआ जहाँ हिंदी का स्थान अंग्रेजी से कहीं नीचे था। मेरे अंदर इतना साहस न था कि हिंदी माध्यम के साथ इस प्रतियोगितावादी युग की दिशा बदल सकूँ। मैंने अंग्रेजी का साथ दिया जैसे भारतीय राजाओं ने ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन पर अंग्रेजों का साथ दिया था। इस निर्मम हालत में जब हिंदी भाषा को मुझ जैसे प्रबल हिंदी समर्थको की आवश्यकता थी, मैंने हिंदी भाषा के ममतामयी आँचल से अपना हाथ खींच लिया। अगर हिंदी भाषा की जिह्वा होती तो चीख-चीख कर मुझसे निवेदन करती और कहती कि मैं उसे छोड़कर न जाऊँ। आखिर क्यों मैं इतना निर्दयी हो गया हूँ? वो मुझसे अवश्य कहती कि आखिर क्यों मैं अंधों की तरह लकीर का फ़क़ीर हो गया? क्यों बहरों की तरह हिंदी के लिए अपनी श्रवणेन्द्रियों को बंद कर दिया? क्या फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, जापान, इटली आदि देशों में विधि उनकी भाषा में नहीं पढ़ाई जाती? तो फिर मेरे ही साथ ये घृणित पक्षपात क्यों? मातृभाषा मुझसे अवश्य पूछती कि मुझ सगी से ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों कर रहा है तू? मानती हूँ कि उच्चतम न्यायालय की कार्यालयीय भाषा अंग्रेजी है, मगर मेरे उत्थान के लिए क्या तू इस व्यवस्था के संशोधन का बीड़ा नहीं उठा सकता ? आखिर कौन सा पाप किया है मैंने जो अपने ही राष्ट्र में इतनी उपेक्षित हो गयी? क्या तुम सब देशवासी राष्ट्रभाषा के रूप में मेरा अस्तित्व मिटाना चाहते हो?
अगर मैं वहां उपस्थित होता तो क्या कहता? शायद मैं केवल इतना कह पाता कि हे माँ ! मुझे क्षमा करो। निश्चय ही मैं तुम्हारा सम्मान करता हूँ किन्तु इसके लिए मैं अपने भविष्य के साथ समझौता नहीं कर सकता। विश्व स्तर पर जाने के लिए मुझे तुम्हारे उत्थान का मोह त्यागना ही होगा। मैं स्वार्थी हूँ और मुझे अपना उत्थान अधिक प्रिय है। मुझसे आप इतनी आशा न करें। हे माँ ! मैं एक साधारण मनुष्य हूँ, मैं क्रन्तिकारी विचारों का समर्थक तो हूँ पर प्रवर्तक नहीं। मुझे क्षमा करना माँ किन्तु मैं अंग्रेजी भाषा का साथ नहीं छोड़ सकता।
आज मैं अंग्रेजी भाषा को सीखने की दौड़ में बहुत आगे आ चूका हूँ। हिंदी और उसके उत्थान जैसे विषयों पर चर्चा करने का समय मेरे पास कदापि नहीं हैं। अब सवाल ये उठता है कि यह लेख मैं हिंदी में क्यों लिख रहा हूँ !
अजी अब आपसे क्या छिपाना, आज जब लगने लगा था कि मैं अच्छी अंग्रेजी पढ़, लिख और बोल सकता हूँ तभी मेरे अवचेतन मन ने इस विषय पर एक लेख लिखने को कहा और वो भी अंग्रेजी में और जब मैंने लिखना शुरू किया तो मेरे पसीने छूटने लगे। अंग्रेजी भाषा और उसकी शब्दावली पर आज भी मेरी पकड़ उस स्तर की नहीं थी कि मैं एक अच्छा लेख लिख सकूँ लेकिन प्रण तो कर ही लिया था सो किसी भी हालत में उसे पूरा करना था। यकायक दिमाग में एक विचार कौंधा कि क्यों न हिंदी में लेख लिखा जाये? कम से कम हिंदी भाषा के माध्यम से विचारों का विस्तार तो हो सकेगा भले ही अंग्रेजी का विस्तार हो न हो। फिर मन में एक और विचार आया कि क्या वह मातृभाषा जिसको मैं कब का तिरस्कृत कर चूका हूँ, मेरा साथ देगी? क्या मेरा धूमिल हिंदी शब्द भण्डार मुझे एक लेख लिखने की आज्ञा देगा ?
लेकिन वो कहते हैं न कि "पूत कपूत सुने बहुतेरे पर माँ न सुनी कुमाता" मातृभाषा ने मुझे लेख लिखने की आज्ञा दे दी। बस फिर क्या था उस सौतेली अंग्रेजी भाषा से हाथ छुड़ाकर मैं मातृ भाषा की गोद में कूद पड़ा और माँ ने भी मुझे गले से लगा लिया मानो मुझे क्षमा करते हुए कह रही हो "सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते"
और आप इसे मेरी अंग्रेजी में लिख पाने की अक्षमता कह लें या फिर मेरा पुनर्जागरण, मगर आज मैं ये फिर कहना चाहता हूँ कि -
"We have to learn English but not at the cost of Hindi"
- विनय प्रकाश सिंह

Comments
Post a Comment