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Showing posts from June, 2020

कविता - 'माँ की मुस्कुराहट' (Poem: Maa Ki Muskurahat)

माँ, बहुत कम देखा है मैंने तुझे खुलकर मुस्कुराते हुए  बिना शिक़ायत सुबह जल्दी उठ जाते हुए और देर रात सबको सुलाते हुए दिन भर चूल्हे की आग में रोटी सा सिकते हुये और फिर रात में अगली सुबह का इंतज़ार करते हुए देखा है तुझे अक्सर खाली  डब्बों में चंद सिक्के छिपाते हुए और फिर उन सिक्कों को जोड़-जोड़ मेरी मुस्कुराहटों पे  लुटाते हुए  मेरी स्कूल की मैली  यूनिफॉर्म को अपने हाथों से रगड़ते हुए  और फिर अक्सर मेरी फ़ीस को लेकर पापा  से झगड़ते  हुए हाँ, बहुत कम देखा है मैंने तुझे खुलकर मुस्कुराते हुए  माँ वो तू ही तो है जो जाने कितनी ही बार मरती है मेरे हौंसलों  को ज़िंदा  रखने  के  लिए मुझे रोता  देख मुझे बाँहों में कसने के लिए हाँ माँ, मैंने तुझको देखा है अक्सर खाली कनस्तर में कुछ टटोलते हुए  अक्सर दुकानों पर  लाला से अनाज का दाम मोलते हुए  सबने सुना होगा फ़रिश्तों को पर मैंने देखा है तुझे बहुत कम बोलते हुए  अपने आँचल में जो तूने बिंदी के लिए ५ रुपये बचाये थे  देखा है तुझको ज़रूरत पर उस गांठ को भी खोलते हुए...

कहानी - 'ग्यारहवीं पास या फ़ेल ?' (Short Story: Gyarahvi Pass Ya Fail?)

वैसे तो ज़िन्दगी के तीन दशक गुज़ार चुका हूँ पर जब भी ये वाक़या याद आता है मैं सोलह का हो जाता हूँ। ज़िन्दगी की किताब में धुंधले हो चले पन्नो में से कुछ क़िस्से अमिट रह जाते हैं और ये क़िस्सा भी कुछ ऐसा ही है | वैसे आप मानो या न मानो बीती ज़िंदगी के बुरे वक़्त की यादें ज़्यादा गुदगुदाती हैं।  ग्यारहवीं में था मैं, हाँ ग्यारहवीं। बोर्ड एग्ज़ाम से ठीक एक साल पहले | जिसके लिए किताबो में उलझे रहने वाले प्रकांड पंडित कहते हैं " फर्स्ट ईयर इज़ नॉट द  रेस्ट ईयर" सुना होगा आपने भी कभी न कभी पर मुझ जैसों को ये सब दक़ियानूसी लगता था | हाँ-हाँ जनता हूँ बोर्ड है। दसवीं भी तो निकाली थी क्रिकेट खेलते-खेलते, ये भी निकाल देंगे। यही कॉन्फिडेंस हुआ करता था।  वैसे कोई नई बात नहीं हम मिडिल क्लास वालों के लिए जब माँ चिल्ला-चिल्ला के पूरे मोहल्ले में न पढ़ने का ढिंढोरा पीट देती थी। "दिन भर क्रिकेट, दिन भर आवारागर्दी। थोड़ा वक़्त किताबों को भी दे दे लाटसाहब, हम कोई कुबेर नहीं हैं" और बड़ी बहन इस आग में घी डालने से चूक जाये, भला ऐसा हो सकता है ? "बाल तो देखो माँ इसके, चाल-ढाल बिलकुल बदल सी गई है"...

क़िस्सा 'विविध-भारती' का (Short Story: Kissa Vividh Bharti Ka)

ये क़िस्सा कुछ पुराना है। ये क़िस्सा है विविध और भारती का। हमारे पुराने कपड़ों से ज़्यादा पुराना पर हमारी बीती यादों से कुछ कम  पुराना। १९८० का दशक, जब हमारी ज़िन्दगी ब्लैक एंड वाइट फ्रेम्स में ज़्यादा रंगीन हुआ करती थी।  ऐसा वक़्त जब  हमारी ज़िन्दगी में सोशल मीडिया से ज़्यादा रेडियो गुनगुनाया करता था। एक ऐसा दौर जब खुशियाँ हमारे घर का पता ढूँढते हुए ख़ुद-ब-ख़ुद आ जाया करती थी। अनगिनत नाते रिश्तेदारों के बीच ग़म कहीं सिकुड़ा सा बैठा रहता था।  ये किस्सा भी कुछ उसी दौर का है |  भारती  का दिल उस वक़्त मानो थम सा जाता है जब टेबल पर सलीके से रखा रेडियो अचानक से गुनगुनाना बंद कर देता है।  पहले पहल उसे लगा जैसे कुछ ख़ास नहीं हुआ पर धीरे-धीरे जब रेडियो के स्पीकर से आवाज़ आना बंद हो गई तो मानो  वो गहरे दुःख में डूब गई, उसकी चुलबुलाहट मानो फ़ाख़्ता हो गई। अचानक से किशोर, लता, मन्ना डे, रफ़ी, आशा सब गूंगे से हो गए। हाय ! एक रेडियो ही तो था गर्मी की दुपहर में जिसको सुन और सुना लिया करती थी। कितनी मिन्नतों के बाद आया था रेडियो घर...

कहानी - 'नुक्कड़ का फ़क़ीर' (Short Story: Nukkad Ka Fakir)

"पूजता हूँ कभी बुत को कभी पढ़ता हूँ नमाज़, मेरा मज़हब कोई हिन्दू न मुसलमाँ समझा"                                                                        - मातम फ़ज़ल मोहम्मद कुछ रोज़ से ये नुक्कड़ का फ़क़ीर दिखाई नहीं दिया, जाने कहाँ चला गया है ! वैसे पहले मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि वो है भी या नहीं भला हमारी ज़िन्दगी में तक़लीफ़ें कम हैं जो हम किसी और का पूछने चलें ? जिए या मरे हमें क्या। खाये या भूखा रहे किसको फ़र्क़ पड़ता है ? हमें भी तो अपनी ज़िन्दगी देखनी है, ऐसे फ़क़ीर जाने कितने हैं। संजू जब स्कूल से लौटता है तो मेरी पत्नी संध्या उसे लेने बस स्टॉप पर जाती है। उस दिन जब संध्या बस स्टॉप तक पहुँचने में लेट हो गई तो उस फ़क़ीर ने संजू को घर तक छोड़ दिआ। संध्या तो उस दिन डर ही गई थी, जाने कैसे फटे-पुराने कपड़े पहना था। सुना है ऐसे लोग बड़े चोर होते हैं। मैंने भी संध्या की लापरवाही प...

कहानी - 'सूनापन' (Short Story: Soonapan)

कुछ रोज़ पहले मेरा घर बेहद ख़ामोश हो चला था| न किसी के आने की ख़ुशी न जाने का ग़म और सुबह की ख़ामोशी तो मेरी चाय की तेज़ चुस्कियों से ही टूटती थी या फिर अख़बार के पन्ने पलटने से जो आवाज़ होती है न, वही कमरे और कानों में गूंजती थी बस| जहाँ देखो अजीब सा सूनापन| देहलीज़ लांघ के घर के बहार जाऊँ, उससे भी डर लगता था| किसी अपने को क़रीब से देखे हुए अरसा हो चुका था| वैसे अगर ख़ामोशी अनचाही हो तो उससे बुरा कुछ नहीं| यक़ीन न हो तो ख़ुद से पूछ लो ! ख़ैर, ये कुछ रोज़ पहले की बात थी |  उस दिन सुबह मेरी आँख खुली तो एक अलग मंज़र देखा| बीते कुछ दिनों की ख़ामोशी एक कबूतर के जोड़े के साथ ख़त्म हुई सी लगती थी  जो मेरी बालकनी में आ बैठा था और  सच कहूँ  तो इनकी गुटर-गूँ  मुझे किसी सुरीले गाने से कम नहीं लग रही थी| ऐसा लगा जैसे अरसे बाद कोई घर आया हो| हाँ हाँ जानता हूँ कबूतर हैं पर १७वी मंज़िल पे रहने वाले इंसान से पूछो, उसे तो हर बोलती चीज़ में ज़िन्दगी दिखेगी | इंसान  हो या परिंदा इस बात से कहाँ फर्क पड़ता है? जाने क्यों उस दिन फीकी चाय भी मीठी सी लगने लगी थी और चाय ही नहीं सच कहूँ तो इन मेहमानो को ...

इम्युनिटी क्या है और क्या हैं इम्युनिटी बढ़ाने के आयुर्वेदिक उपाय? (What is immunity and how to boost immunity with the help of Auyrved? - In Hindi)

कोरोना महामारी के इस दौर में आप एक शब्द बहुत सुन रहे होंगे -' इम्युनिटी (Immunity)' ।   डॉक्टर और कोरोना के सभी जानकार इस बीमारी से लड़ने के लिए इम्युनिटी बढ़ाने पर ज़ोर दे रहे हैं। तो आइये आसान भाषा में समझते हैं, इम्युनिटी क्या है और इसे आयुर्वेदिक/घरेलू उपायों से कैसे बढ़ा सकते हैं?  आपने अक्सर देखा होगा कि कुछ लोग जो दिखने में तो स्वस्थ लगते हैं लेकिन बहुत जल्दी-जल्दी बीमार हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण उनके शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) का कमज़ोर होना है, जिसकी वजह से उनकी रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और खाँसी, ज़ुकाम जैसी छोटी बीमारियाँ तो उन्हें बार-बार घेर लेती हैं। जिस तरह से एक योद्धा तलवारबाज़ी में ढाल का प्रयोग करके ख़ुद को दुश्मन के वार से बचाता है उसी तरह से हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता रोगों से लड़ने में हमारी मदद करती है। हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की यह क्षमता ही हमारी 'इम्युनिटी' है। अब सवाल यह उठता है कि अपने शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) को मज़बूत कैसे ...

कोरोना के लक्षण दिखाई दें तो क्या करें? What to do if you have symptoms of corona virus (In Hindi)?

Corona के लक्षण पहचानिये:  कोरोना के मरीज़ों में अलग-अलग तरह के लक्षण दिखाई दे सकते हैं - हल्के लक्षणों से लेकर गंभीर बीमारी तक। वायरस के संपर्क में आने के 2-14 दिन बाद तक लक्षण दिखाई दे सकते हैं। अगर ये लक्षण दिखाई दें तो कोरोना हो सकता है: • बुखार या ठंड लगना • सूखी खांसी • सांस लेने में कठिनाई • थकान व मांसपेशियों या शरीर में दर्द • सरदर्द • स्वाद या गंध महसूस न कर पाना • गले में ख़राश • सीने में कसावट या बहती नाक • उलटी अथवा मितली • दस्त हालाँकि इस सूची में सभी संभावित लक्षण शामिल नहीं हैं। नए लक्षण मिलने पर सम्बंधित सरकारी विभाग इस सूची को update करते जा रहे हैं। अस्वस्थ महसूस करने पर क्या करें ? १. सबसे पहले अपने डॉक्टर से अपने लक्षणों के बारे में बात करें और अगर डॉक्टर सलाह दे तो तुरंत कोरोना जाँच कराएं। २. चिकित्सकीय परामर्श लेने के अलावा किसी भी काम से घर से बाहर न निकलें। ३. कोरोना से संक्रमित अधिकांश लोगों को हल्की बीमारी होती है और वे बिना चिकित्सा देखभाल के घर पर ठीक हो सकते हैं। अगर मामूली तौर पर बीमार हैं तो घर ...

सत्यजीत राय: भारतीय सिनेमा जगत का प्रकाश पुंज (Satyajit Ray: The Shining Star of Indian Cinema)

२   मई   १९२१ ,  एक   तारीख़   जो   भारतीय   फिल्म   जगत   के   इतिहास   में   हमेशा   के   लिए   दर्ज   हो   गयी   क्योंकि   इसी   दिन  जन्म  हुआ   था   २०वीं   शताब्दी   के   सर्वोत्तम   फिल्म   निर्देशकों   में   से   एक   सत्यजीत   राय   का।  किसी   शायर   ने   क्या   खूब   कहा   है :  "ये   तो   इक   रस्म - ए - जहाँ   है   जो   अदा   होती   है ,  वर्ना   सूरज   की   कहाँ   सालगिरह   होती   है।" सत्यजीत राय , भारतीय फिल्म जगत का वह सूरज जिसकी रोशनी में छोटे - बड़े कई फ़िल्मी सितारे जगमगाये। फिल्म जगत में उनके योगदान को आंकना सूरज को रोशनी दिखने जैसा है। कई बड़े फिल्म निर्माता आज भी उनकी फिल्मों से प्रेरणा लेते हैं। श्याम बेनेगल से लेकर अ...