ये क़िस्सा कुछ पुराना है। ये क़िस्सा है विविध और भारती का। हमारे पुराने कपड़ों से ज़्यादा पुराना पर हमारी बीती यादों से कुछ कम पुराना। १९८० का दशक, जब हमारी ज़िन्दगी ब्लैक एंड वाइट फ्रेम्स में ज़्यादा रंगीन हुआ करती थी। ऐसा वक़्त जब हमारी ज़िन्दगी में सोशल मीडिया से ज़्यादा रेडियो गुनगुनाया करता था। एक ऐसा दौर जब खुशियाँ हमारे घर का पता ढूँढते हुए ख़ुद-ब-ख़ुद आ जाया करती थी। अनगिनत नाते रिश्तेदारों के बीच ग़म कहीं सिकुड़ा सा बैठा रहता था। ये किस्सा भी कुछ उसी दौर का है |
भारती का दिल उस वक़्त मानो थम सा जाता है जब टेबल पर सलीके से रखा रेडियो अचानक से गुनगुनाना बंद कर देता है। पहले पहल उसे लगा जैसे कुछ ख़ास नहीं हुआ पर धीरे-धीरे जब रेडियो के स्पीकर से आवाज़ आना बंद हो गई तो मानो वो गहरे दुःख में डूब गई, उसकी चुलबुलाहट मानो फ़ाख़्ता हो गई। अचानक से किशोर, लता, मन्ना डे, रफ़ी, आशा सब गूंगे से हो गए। हाय ! एक रेडियो ही तो था गर्मी की दुपहर में जिसको सुन और सुना लिया करती थी। कितनी मिन्नतों के बाद आया था रेडियो घर में, कितने पापड़ बेलने पड़े थे। अब बाबूजी से क्या कहेगी ? अम्मा को क्या जवाब देगी की क्या हुआ ? पर इन सबसे भी बड़ा सवाल की अब वो रेडियो ठीक कैसे होगा ?
बहुत सोचा, कुछ समझ में न आया। बाबूजी जी एक हफ़्ते के लिए शहर गए हैं तो उनसे कह नहीं सकती और माँ ? बाप रे बाप ! पहले सैकड़ो सवाल होंगे, माँ नाक सिकुड़ेगी सो अलग, कहेगी सर पे चढ़ा रखा है बिलकुल। पर एक हफ्ते रेडियो के बिना रह पाना नामुमकिन सा है।
डरते संभलते हुए जब देखा की माँ काकी के घर कथा में गई हुई है, चुपके से निकल गई घर से। डर तो था पकड़े जाने का पर उससे ज़्यादा चिंता थी रेडियो ठीक कराने की। वापस रेडियो के साथ गुनगुनाने की। पूरे गाँव में एक ही शख़्स था जो रेडिओ ठीक कर सकता था - 'विविध' सो भारती तुरंत निकल गई और रास्ता पूछते-पूछते पहुँच भी गई और बिना किसी तक़ल्लुफ़ के तपाक से बोली "मेकैनिक जी, ज़रा सुधार कर दो हमारे रेडियो में।" कुछ वक़्त इंतज़ार करने के बाद जब पता चला कि आज नहीं मिलेगा तो दिल धक् से रह गया। विविध ने कहा "कल ले जाना।" अब क्या करती रुआंसे मन से घर को लौट आई और फिर पूरी रात अगले दिन के इंतज़ार में कटी। ख़ैर सुबह हुई, दुपहर भी हुई | मौक़ा देखा और फिर चुपके-चुपके निकल गई घर से | पर हाय री किस्मत, पहुँची तो विविध बोला "कुछ ज़्यादा खराबी है थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा।" "कितना इंतज़ार कराओगे?" उसकी चुलबुली आँखों में देखते हुए विविध बोला "कुछ वक़्त और दे दो।" वैसे पुरे गाँव में नाम था विविध का। जितना अच्छा स्वाभाव, उतना ही अच्छा काम। मज़ाल है कभी देर की हो किसी के काम में | मग़र इस बार मामला कुछ और ही था। "अच्छा चलो अब देर होने लगी है, कल आउंगी पर पक्के से सुधार कर के रखना।" "जी बिलकुल" विविध मुस्कुराया।
कभी-कभी ऑंखें सब कह जाती है। लब हमेशा साथ दें ये ज़रूरी तो नहीं | भारती को एक बार और जी भर देखने की चाहत ही उससे ये टालमटोल करवा रही थी। भारती को भी ऐतराज़ नहीं हुआ। पर दोनों को ही ये मालूम था कि ये सिलसिला लम्बा नहीं चलेगा और आखिरकार पाँच दिन तक रेडियो रख कर उसे छठे दिन रेडियो को लौटाना ही पड़ा | भारती ने कहा "बजाकर तो दिखाओ। " जब चलाया तो रेडियो पर गाना बज रहा था "अभी न जाओ छोड़ के...." दोनों की मुस्कान काफी थी उस पल को बयाँ करने के लिए। एक सिलसिला जो कुछ दिन पहले शुरू हुआ था अब ख़त्म होने को था। दोनों के ही दिल कुछ भारी से थे।
इस क़िस्से को कुछ साल बीत चुके थे। भारती का ब्याह हो चुका था। पर फिर भी कुछ पल ज़िन्दगी में जीने का शायद बार-बार मन करता है, तभी तो आज फिर से विविध ने रेडियो स्टेशन विविध-भारती में एक चिट्ठी लिख ककर गाने की फ़रमाइश की है "अभी न जाओ छोड़ के...."
- मनीष विश्वास
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