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Showing posts from September, 2020

मैं और मेरी अंग्रेजी

मैं और मेरी तन्हाई अक़्सर ये बातें करते हैं कि तुम होतीं तो ऐसा होता, तुम होतीं तो वैसा होता।  लता जी और अमिताभ जी की आवाज़ में गाये हुए एक मशहूर गीत की पंक्तियाँ हैं ये। कुछ दिनों पहले ये पंक्तियाँ मेरे कानों में पड़ीं तो अनायास ही इन पंक्तियों के भावार्थ ने मेरा वो अतीत याद दिला दिया जब मैं हिंदी माध्यम का मेधावी छात्र हुआ करता था (कृपा करके इस बात की पुष्टि के लिए मेरे विद्यालय न जाएँ) और ऊपर से हिंदी भाषा का कट्टर समर्थक पर अंदर ही अंदर अंग्रेजी बोलने और सीखने की इच्छा से ओत-प्रोत। उस समय मैं और मेरी तन्हाई अक़्सर ये बातें करते थे कि काश मैं भी कॉन्वेंट में पढ़ा होता; काश मैं भी फर्राटेदार अंग्रेजी बोल सकता; मैं भी ईंट का जवाब पत्थर से न सही पर अंग्रेजी का जवाब अंग्रेजी में तो दे पता। काश जब भी मुझे अंग्रेजी बोलना होता तो मुझे On लगेगा या Over, So लगाऊँ या Therefore; have been क्यों had been क्यों नहीं जैसे यक्ष प्रश्नों से गुज़रना न पड़ता पर वास्तव में मैं ये बात तन्हाइयों से ही कर पाता था क्योंकि मेरी सुनने वाला और था ही कौन? अपने क्लास में शायद सभी अंधे थे ...

कहानी - 'अधूरा चाँद " (Short Story - 'Adhoora Chaand')

द रवाज़े पर दस्तक हुई...जब मृणाल बाबू बाहर आये तो मालूम हुआ कि डाकिया कोई तार लेकर आया है। उसने नाम तो नहीं पूछा बस लिफ़ाफ़े पर पता देखा, दस्तख़त लिए और चलता बना। मृणाल बाबू क्षण भर सोचते रहे कि  किसने भेजा होगा? सोचना जायज़ भी था और उन्हें तार लिखने वाला कोई था भी तो नहीं। माँ के सिधार जाने के बाद कलकत्ता की भागदौड़ से थोड़ा दूर एकांत वास करने को उन्होंने अपनी जमा पूँजी लगा दी थी इस घर को लेने में। अब आगे-पीछे कोई न था।  बस एक रखवाल था जो उनकी गैरहाज़िरी में घर का ध्यान रखता था। जीवन के पचपनवें साल में जब अपने बालों में हाथ फेरते तो सफ़ेद हो चले बालों में कुछ काले बाल झाँकते दिखाई देते। मृणाल  बाबू को चाँद-तारों का शौक था। एक टेलिस्कोप था जिससे देर रात तक चाँद-तारों की चाल पर नज़र रखते थे। कभी-कभी भोर तक जागते रहते। शायद पूरे कलकत्ते शहर में वही होंगे जो चौदहवीं के चाँद की ख़ूबसूरती को टेलिस्कोप में उतार के उसे भी अधूरा कह दिया करते और इस बात पर उनका रखवाल हमेशा अचंभित सा रह जाता " भला चौदहवीं के चाँद को भी कोई अधूरा कहता ...