दरवाज़े पर दस्तक हुई...जब मृणाल बाबू बाहर आये तो मालूम हुआ कि डाकिया कोई तार लेकर आया है। उसने नाम तो नहीं पूछा बस लिफ़ाफ़े पर पता देखा, दस्तख़त लिए और चलता बना। मृणाल बाबू क्षण भर सोचते रहे कि किसने भेजा होगा? सोचना जायज़ भी था और उन्हें तार लिखने वाला कोई था भी तो नहीं। माँ के सिधार जाने के बाद कलकत्ता की भागदौड़ से थोड़ा दूर एकांत वास करने को उन्होंने अपनी जमा पूँजी लगा दी थी इस घर को लेने में। अब आगे-पीछे कोई न था। बस एक रखवाल था जो उनकी गैरहाज़िरी में घर का ध्यान रखता था। जीवन के पचपनवें साल में जब अपने बालों में हाथ फेरते तो सफ़ेद हो चले बालों में कुछ काले बाल झाँकते दिखाई देते। मृणाल बाबू को चाँद-तारों का शौक था। एक टेलिस्कोप था जिससे देर रात तक चाँद-तारों की चाल पर नज़र रखते थे। कभी-कभी भोर तक जागते रहते। शायद पूरे कलकत्ते शहर में वही होंगे जो चौदहवीं के चाँद की ख़ूबसूरती को टेलिस्कोप में उतार के उसे भी अधूरा कह दिया करते और इस बात पर उनका रखवाल हमेशा अचंभित सा रह जाता " भला चौदहवीं के चाँद को भी कोई अधूरा कहता है?"
कलकत्ता के कुलीन वर्ग में जन्मे मृणाल बाबू के नसीब में सब कुछ था, सिवाय विवाह के। कुछ वर्षों पहले तक सबने खूब कोशिशें कीं। कई रिश्ते देखे गए मगर मृणाल को मंज़ूर न हुआ। माँ ने जाने कितनी मिन्नतें कीं " एक बार अपने पोते को हाथ में खिला लूँ फिर परलोक सिधार जाउँगी। ये सब मृणाल के लिए नया न था। माँ के बाद उनके करीबी मित्रों ने ये बीड़ा उठाया। कुछ ने उनकी बढ़ती उम्र का हवाला दिया तो कुछ ने बिना परिवार जीवन न होने का दावा किया। शायद ही कोई ऐसा विकल्प बचा होगा जिससे मृणाल को मानाने की कोशिश न की गयी हो। मगर सारे विकल्प असफल ही रहे।
ख़ैर, तार अभी जस का तस टेबल पर पड़ा था। खोलते तो देर नहीं लगती पर तार किसने भेजा होगा इस रहस्य को सुलझाने में जो आनंद है वो एकदम से समाप्त कर देना भी तो ठीक नहीं। शायद यहीं छोटे-छोटे रहस्यात्मक आनंद हैं जो हमारे जीवन में रस घोलते हैं।
दोपहर में खाने की मेज़ पर जब रखवाल ने ईलिश माछ के साथ खाना परोसा तो पूछ बैठा "बाबू, किसकी चिट्ठी थी ?" कहने लगे जाने कौन याद कर बैठा ढलती उम्र में और फिर मुस्कुराने लगे। रखवाल हमेशा की ही तरह अचंभित देखता रहा उनको "आप और आपकी बातें !"
ये तार किसने भेजा होगा के उत्तर में उनके ज़ेहन में कई नाम आये मगर नंदिता के नाम ने उन्हें सबसे ज़्यादा रोमांचित किया। आज भी याद है। बनारस में मिले थे पहली दफा। अपने स्नातक के दौरान बनारस लोक नाट्य मंच पर। वैसे तो मृणाल खगोल-शास्त्र में अध्ययनरत थे मगर साहित्य और नाट्य-शास्त्र में अभिरुचि रखने के कारण अक्सर ऐसे मंच पर उपस्थित रहते थे। उस पहली मुलाक़ात ने ही अगली कुछ मुलाक़ातों की नींव रखी। पहले दिन का अपरिचित भाव समय के साथ-साथ एक सुगम परिचय में बदलता गया। कभी-कभी शाम किसी नुक्कड़ पे चाय की दुकान पर किसी पुस्तक, नाटक या फिर खगोलीय खोज की चर्चा में निकल जाती। नाट्य मंच से शुरू हुई ये मुलाक़ातें गंगा के घाट तक पहुँच चुकी थीं, जहाँ गंगा के पानी में आधे चाँद की परछाईं भी उन्हें पूरी लगती थी।
ऐसे में दो दिलों में प्रेम की शंका न हुई होगी ? ज़रूर हुई होगी। किन्तु दोनों ने ही इस बात का ज़िक्र किसी से कभी न किआ। वजह? जाने कितनी होंगी। लोक-लाज, जाति-धर्म और प्रेम भी तो अपने आप में एक वजह ही है। "वैसे प्रेम शब्द है ही गूढ़ और रहस्यात्मक। कभी तो गला फाड़कर इज़हार करने पर भी सुनाई नहीं देता और कभी तो मौन रह कर भी प्रेम का एक-एक शब्द कानो में मधुर संगीत घोल देता है।"
वैसे मौखिक रूप से इस बात की पुष्टि कभी न हो पायी थी कि दोनों में प्रेम है भी या नहीं। कहा भी तो नहीं था किसी ने। क्या सिर्फ़ भाव से ही पता चलता होगा? चलता होगा पर कभी चाँद को टेलिस्कोप से निहारते हुए ख़याल ज़रूर आता नंदिता का और ख़याल के साथ ये सवाल भी की क्या नंदिता को भी प्रेम रहा होगा?
ऐसा नहीं की मृणाल बाबू ने कोशिश नहीं की। जाने उन दिनों कितने ही ख़त लिखे। मगर सब आज भी उन्हीं की डायरियों के बीच दबे धूल खा रहे हैं। स्नातक के आखरी दिन तक सोचते रहे थे। शायद मन में एक ही भाव लिए दोनों ने एक दूसरे को अलविदा कहा होगा। ख़ैर अब तो बरसों हो चले हैं इस बात को।
आखिर शाम को चाय के बाद मृणाल बाबू ने तार उठाया। लिफ़ाफ़ा खोलते हुए भी जाने कितने ही नामों ने उनके ज़ेहन के गहरे समंदर में गोते लगाए। आखिरकार तार पढ़ा। एक बार नहीं कई बार पढ़ा। मानो कुछ अधूरा सा पूरा हुआ हो, मानो बरसों का बीता हुआ वापस आया हो। तार किसी मित्र का था और बनारस लोक नाट्य मंच के अध्यक्ष का। बरसों बाद एक आमंत्रण था। आने का विशेष अनुग्रह था। तार के साथ एक छोटा सा इश्तेहार नुमा कुछ परचा था जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था... नाटक का नाम "अधूरा चाँद" नाटककार "नंदिता"
मृणाल बाबू ने रखवाल को आवाज़ दी "ज़रा टेलिस्कोप तो लगाना"
कुछ देर बाद रखवाल ने टेलिस्कोप लगते हुए कहा "वैसे बाबू आज क्या ही दिखेगा? बादलों की-सी रात में और चाँद भी तो पूरा नहीं है।"
मृणाल बाबू ने टेलिस्कोप में चाँद का अक्स देखते हुए कहा "अरे आज ही तो चाँद पूरा है।"
इस पर रखवाल हमेशा की ही तरह अचंभित होकर मृणाल बाबू को देखता रहा और मृणाल बाबू, वो तो बस टेलिस्कोप में चाँद को निहारते रहे।
- मनीष विश्वास
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