कुछ रोज़ पहले मेरा घर बेहद ख़ामोश हो चला था| न किसी के आने की ख़ुशी न जाने का ग़म और सुबह की ख़ामोशी तो मेरी चाय की तेज़ चुस्कियों से ही टूटती थी या फिर अख़बार के पन्ने पलटने से जो आवाज़ होती है न, वही कमरे और कानों में गूंजती थी बस| जहाँ देखो अजीब सा सूनापन| देहलीज़ लांघ के घर के बहार जाऊँ, उससे भी डर लगता था| किसी अपने को क़रीब से देखे हुए अरसा हो चुका था| वैसे अगर ख़ामोशी अनचाही हो तो उससे बुरा कुछ नहीं| यक़ीन न हो तो ख़ुद से पूछ लो ! ख़ैर, ये कुछ रोज़ पहले की बात थी |
उस दिन सुबह मेरी आँख खुली तो एक अलग मंज़र देखा| बीते कुछ दिनों की ख़ामोशी एक कबूतर के जोड़े के साथ ख़त्म हुई सी लगती थी जो मेरी बालकनी में आ बैठा था और सच कहूँ तो इनकी गुटर-गूँ मुझे किसी सुरीले गाने से कम नहीं लग रही थी| ऐसा लगा जैसे अरसे बाद कोई घर आया हो| हाँ हाँ जानता हूँ कबूतर हैं पर १७वी मंज़िल पे रहने वाले इंसान से पूछो, उसे तो हर बोलती चीज़ में ज़िन्दगी दिखेगी | इंसान हो या परिंदा इस बात से कहाँ फर्क पड़ता है? जाने क्यों उस दिन फीकी चाय भी मीठी सी लगने लगी थी और चाय ही नहीं सच कहूँ तो इन मेहमानो को देख कर मेरे खाने का ज़ायका भी बदल सा गया था। दोपहर होते-होते देखा कि बालकनी में ही उन्होंने घास इकठ्ठा करके एक घोंसले जैसा कुछ बनाया है | आशियाना होगा...चलो कोई तो आया इस वीराने में | मैंने इन मेहमानों के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी | नाराज़ होके चले न जाएँ इसलिए दाने-पानी का इंतज़ाम मैंने बालकनी में ही कर दिया। वाह ! इनकी गुटर-गूँ में भी क्या सुकून है ! ख़ामोशी कल की बात थी। सूनापन बीती बात थी।
वैसे मुझे उनके चले जाने का डर ज़रूर था पर सुना है परिंदे कुछ दिन अपने आशियाने में ही रुकते हैं। अपने बच्चों को बड़ा करते हैं और फिर उड़ जाते हैं। हुआ भी ऐसा। कुछ दिनों में ही मैंने वहाँ एक नन्हा परिंदा देखा, नन्हा कबूतर | किसकी शक्ल पे गया होगा ये कहना मुश्किल है। मुझे तो सब एक से दिखते हैं। ऐसा लगा जैसे मेरी भी कुछ ज़िम्मेदारी बढ़ गई है। अब हर वक़्त ध्यान जो रखना पड़ता कि दाने पानी में कोई कमी न हो। एक अजीब सा रिश्ता बन चुका था | उन्हें भी मुझसे कोई ऐतराज़ नहीं था शायद | तभी तो जब भी पास जाता वो डर के उड़ते नहीं थे| दिन में कई दफा बालकनी से ही सट के खड़ा रहता था। उनको निहारता रहता और फिर मुस्कुराता | वो भी गुटर-गूँ करते रहते। "देखो ज़रा कैसे मुँह खोल रहा है ! और माँ, वो कैसे दाने खिला रही है नन्हे कबूतर को ! कुदरत को जितनी बार क़रीब से देखो उतनी बार हैरानी में डाल देती है।" और ज़िन्दगी ? वो तो जीने के बहाने सीखा ही देती है आपको।
वक़्त कैसे गुज़रता है कभी पता ही नहीं चलता | कहाँ कुछ रोज़ पहले ये मेहमान मेरी बालकनी में आये थे और आज वो नन्हा कबूतर वो भी उड़ने की कोशिश में लगा है। ये इंसानो की तरह बड़े क्यों नहीं होते ? धीरे-धीरे,सालों में ?
महीना होने को चला है। नन्हा कबूतर उड़ने लगा है | कल जितना उड़ा था उससे कुछ ज़्यादा उड़ा है | शायद एक या दो दिन में ये अच्छे से उड़ने लगेगा और फिर ...कहने को जी नहीं चाहता पर शायद तब ये उड़ जायेंगे ? ये सूनापन मुझे फिर से घेर लेगा। बीते कुछ रोज़ में ये मेहमान कुछ कम वक़्त क लिए दिखने लगे हैं | पर फिर भी सुबह-शाम इनकी गुटर-गूँ सुन ही लेता हूँ | मै दाना-पानी दिन में दो दफ़ा ज़रूर देखता हूँ। अब शायद यही इनका घर है | शायद अब ये मेहमान मेरे घर का हिस्सा हैं। ये बात मुझे आजकल सबसे ज़्यादा सुकून देती है |
कुछ रोज़ और गुज़र चुके हैं इनके साथ। पर...आज इतनी ख़ामोशी क्यों है ! बालकनी में इतना सूनापन ! सोचते हुए धड़कने कुछ तेज़ हो गयी हैं। सोचा देखूँ ज़रा। देखा तो बालकनी में कुछ दाने बिखरे पड़े थे और बर्तन से पानी सूख चूका था | खुले आसमान को देखा तो परिंदे उड़ रहे थे। दूर बहुत दूर ! इतना दूर की कुछ ही पलों में मेरी आँखों से ओझल हो गए और पीछे छोड़ गए वही सूनापन।
- मनीष विश्वास
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