वैसे तो ज़िन्दगी के तीन दशक गुज़ार चुका हूँ पर जब भी ये वाक़या याद आता है मैं सोलह का हो जाता हूँ। ज़िन्दगी की किताब में धुंधले हो चले पन्नो में से कुछ क़िस्से अमिट रह जाते हैं और ये क़िस्सा भी कुछ ऐसा ही है | वैसे आप मानो या न मानो बीती ज़िंदगी के बुरे वक़्त की यादें ज़्यादा गुदगुदाती हैं।
ग्यारहवीं में था मैं, हाँ ग्यारहवीं। बोर्ड एग्ज़ाम से ठीक एक साल पहले | जिसके लिए किताबो में उलझे रहने वाले प्रकांड पंडित कहते हैं " फर्स्ट ईयर इज़ नॉट द रेस्ट ईयर" सुना होगा आपने भी कभी न कभी पर मुझ जैसों को ये सब दक़ियानूसी लगता था | हाँ-हाँ जनता हूँ बोर्ड है। दसवीं भी तो निकाली थी क्रिकेट खेलते-खेलते, ये भी निकाल देंगे। यही कॉन्फिडेंस हुआ करता था।
वैसे कोई नई बात नहीं हम मिडिल क्लास वालों के लिए जब माँ चिल्ला-चिल्ला के पूरे मोहल्ले में न पढ़ने का ढिंढोरा पीट देती थी। "दिन भर क्रिकेट, दिन भर आवारागर्दी। थोड़ा वक़्त किताबों को भी दे दे लाटसाहब, हम कोई कुबेर नहीं हैं" और बड़ी बहन इस आग में घी डालने से चूक जाये, भला ऐसा हो सकता है ? "बाल तो देखो माँ इसके, चाल-ढाल बिलकुल बदल सी गई है" और कभी-कभी पापा की ग़ुस्से से लाल ऑंखें, इनको डराने के अलावा कोई काम नहीं है क्या? मैं बस कुढ़ के रह जाता था।
माँ मेरे क्रिकेट के पीछे पड़ी रहती थी और मैं नेहा के। मोहल्ले का चाँद कहते थे उसे। मुझ जैसे सैकड़ो थे पीछे उसके पर वो, जाने किसके पीछे पड़ी होगी ! ख़ुशक़िस्मत तो बहुत होगा। वैसे रोटी कपड़े और मकान की चिंता न सताए तो फिर इश्क़ पनप ही जाता है। हाय ! वो भी क्या दिन थे ! पाँच महीने क्रिकेट की गेंद और नेहा के लिए चेहरा चमकाते-चमकाते निकल गए। जाने अच्छा वक़्त हमेशा बिना ब्रेक की गाड़ी पे ही क्यों आता है ? और बुरा वक़्त, वो तो हमेशा पंचर गाड़ी पे ही बैठ के आता है कम्बख़्त। हाँ एक बात और, बुरा वक़्त दस्तक देकर नहीं आता।
वैसे मैं फ़ेल हो जाऊं इतना बुरा नहीं था पढ़ने में, पर बिना पढ़े पास हो जाऊं इतना अच्छा भी कहाँ था ? गणित !! बाप रे बाप सबसे डरावना और उससे भी डरावना उसे पढ़ाने वाला। छ:माही में ही पता चल गया था कितने पानी में हूँ। नेहा और क्रिकेट दोनों कैलकुलस और ट्रिग्नोमेट्री में ऐसे उलझे कि होश उड़ गए। नंबर आये '१३', अजी हाँ पर हम जैसों को फ़र्क़ पड़ता है भला। जैसे-तैसे रिज़ल्ट छुपा लिया और अगले चार महीने भी मज़े में बीते, खाते-पीते। यारों से बातें और नेहा के घर के चक्कर ये काम बदस्तूर किया। वैसे ही जैसे मौलवी मस्जिद में अल्लाह की इबादत और पुजारी मंदिर में भगवान की भक्ति करता है और फिर शुरू हुआ असली खेल। गणित में शून्य के अलावा कोई और अंक दिखता ही नहीं था। दिन, महीने और साल सब बीतने को आया और अब चेहरे का रंग पीला पड़ने लगा था। दिन भर एक ही बात सताती थी ग्यारहवीं में फ़ेल या पास ?
अब दिन भर माँ की बात मानने को जी चाहता। पापा की आँखों में भी प्यार नज़र आता। काश मान ली होती बात। गणित के पहले पेपर के बाद फ़ेल होना तय था। एक छुट्टी में क्या ख़ाक तैयारी करता दूसरे पेपर की। आज भी याद है मन कितना भारी था, मन हुआ था माँ से लिपट के रो डदूँ और कह दूँ माँ, मैं शायद पास न हो पाऊँ। पर इतनी हिम्मत थी ही नहीं। आज भी सोचता हूँ शाम को जाने पिताजी ने कंधे पे हाथ रख के क्यों कहा था "डर मत कुछ नहीं होगा। अगले पेपर की तैयारी कर, पास हो जाएगा। उनके ये शब्द थे जो आज भी नहीं भूला। जाने कहाँ से क्या ताक़त आ गई ! पास होने की ताकत, बुरे को अच्छे में बदलने की ताकत, हार को जीत में बदलने की ताकत। ज़िंदगी के ३६ घंटे किसी रेस्क्यू ऑपरेशन से काम नहीं थे। ख़ुद को बचने का रेस्क्यू ऑपरेशन। एक पुरज़ोर कोशिश कि जैसे अगर ग्यारहवीं में फ़ेल हुआ तो ज़िंदगी में फ़ेल हो जाऊँगा।
रिज़ल्ट के दिन मैं नहीं गया था। हिम्मत ही नहीं थी। मेरा दोस्त अभिषेक ही था जिसमें फ़ेल सुनने की शायद ताक़त थी। वही गया था। मैंने उससे कहा था "भाई बस साथ मत छोड़ना कभी अगर अलग भी हो गए तो। याद है मुझे मैंने फोन किया था उसके घर। डरते-डरते पूछा था "फेल या पास ?" और इतना कहते हुए जितने भी भगवान का नाम सुना था सबका जाप कर लिया था.....और उसने कहा था "पास"...."अबे तू नहीं मेरा बता"...."हाँ-हाँ, तू भी पास।
- मनीष विश्वास
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