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सत्यजीत राय: भारतीय सिनेमा जगत का प्रकाश पुंज (Satyajit Ray: The Shining Star of Indian Cinema)

 मई १९२१एक तारीख़ जो भारतीय फिल्म जगत के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गयी क्योंकि इसी दिन जन्म हुआ था २०वीं शताब्दी के सर्वोत्तम फिल्म निर्देशकों में से एक सत्यजीत राय का। किसी शायर ने क्या खूब कहा है

"ये तो इक रस्म--जहाँ है जो अदा होती हैवर्ना सूरज की कहाँ सालगिरह होती है।"



सत्यजीत राय, भारतीय फिल्म जगत का वह सूरज जिसकी रोशनी में छोटे-बड़े कई फ़िल्मी सितारे जगमगाये। फिल्म जगत में उनके योगदान को आंकना सूरज को रोशनी दिखने जैसा है। कई बड़े फिल्म निर्माता आज भी उनकी फिल्मों से प्रेरणा लेते हैं। श्याम बेनेगल से लेकर अपर्णा सेन, विशाल भारद्वाज, दिबाकर बनर्जी और सुजॉय घोष तक तमाम बड़े निर्देशकों पर उनका असर साफ़ देखा जा सकता है।

सत्यजीत राय प्रमुख रूप से फ़िल्मों में निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन लेखक और साहित्यकार के रूप में भी उन्होंने उल्लेखनीय में ख्याति अर्जित की है। फ़िल्मकार के अलावा वह कहानीकार, चित्रकार और फ़िल्म आलोचक भी थे।

राय के जन्म से धन्य होने का सौभाग्य मिला बंगाल की धरती के सुप्रसिद्ध शहर कलकत्ता को। राय का पूरा परिवार कला साहित्य से जुड़ा रहा। राय के दादा जी 'उपेन्द्रकिशोर राय' एक प्रसिद्ध लेखक, चित्रकार, वायलन वादक संगीतकार थे और पिता 'सुकुमार राय' बांग्ला में बच्चों के लिए रोचक कवितायेँ लिखा करते थे और चित्रकारी भी करते थे। उनकी माँ 'सुप्रभा राय' रवीन्द्र संगीत की मंझी हुई गायिका थीं ऐसे माहौल में पले-बढे राय को सृजन और कलात्मकता तो विरासत में मिलनी ही थी। अपने माता-पिता की इकलौती संतान राय ने ठीक से बोलना भी नहीं सीखा था जब वर्ष १९२३ में इनके पिता इस संसार को विदा कह गए जिसके बाद राय की परवरिश उनकी माँ ने अपने भाई के घर पर रहकर ही की। शुरूआती शिक्षा माँ ने घर में दी, उसके बाद आठ वर्ष की उम्र में उनका दाखिला कलकत्ता के बालीगंज के सरकारी स्कूल में करा दिया। कॉलेज की पढ़ाई उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से की और वहां दो वर्षों तक विज्ञान की पढाई करने के बाद  तीसरे वर्ष अर्थशास्त्र ले लिया क्यूंकि मामाजी ने कहा कि अर्थशास्त्र में स्नातक हो जाते हैं तो उन्हें नौकरी दिला देंगे और उन्हें नौकरी की बहुत जरुरत भी थी.

१९३९ में ग्रेजुएट होने के बाद राय ने मन बना लिया की वह आगे की पढ़ाई नहीं करेंगे लेकिन माँ नहीं चाहती थी की उनका बेटा १८ वर्ष की आयु में नौकरी करे। माँ ने उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए मना लिया और रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन में दाख़िला करा दिया जहां जहाँ राय ने चित्रकारी की शिक्षा नंदलाल बोस और विनोद बिहारी मुखोपाध्याय जैसे कलाकारों से प्राप्त की। उस समय शांतिनिकेतन कला और साहित्य की नवीन भारतीय चेतना के केंद्र के रूप में विश्व भर में चर्चित था।

इसके बाद १९४३ में राय कलकत्ता गए और उन्हें एक ब्रिटिश विज्ञापन एजेंसी 'डी .जे. केमर एंड कंपनी' में कमर्शियल आर्टिस्ट के रूप में काम मिल गया जहाँ काम करते हुए उन्होंने पुस्तकों के आवरण पृष्ठों की साज-सज्जा और चित्रांकन का कार्य पर्याप्त मात्रा में किया, जिनमें जिम कॉर्बेट कीमैन ईटर्स ऑफ कुमाऊं’, जवाहरलाल नेहरू कीडिस्कवरी ऑफ इंडियाऔर 'विभूति भूषण बंद्योपाध्याय' की 'पाथेर पांचाली' का बच्चों के लिए लिखा गया संक्षिप्त संस्करण 'आम अंतिर भेपू' शामिल है। 'आम अंतिर भेपू' ही वह पुस्तक थी जिसकी कहानी के लिए राय ने कई चित्र बनाये और इससे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने इसी कहानी पर आधारित अपनी पहली फिल्म बनाने का निश्चय कर लिया। 

१९४९ में सत्यजीत राय का विवाह बिजोय राय से हुआ, इनके पुत्र हैं संदीप राय जो वर्तमान में एक फिल्म निर्देशक हैं।

१९५० में उनकी कंपनी ने उन्हें पुरस्कार स्वरुप विशेष ट्रेनिंग के लिए लंदन भेजा। फिल्मों के प्रति उनका झुकाव इस बात से समझा जा सकता है कि लंदन में अपने साढ़े चार महीनो के प्रवास के दौरान उन्होंने लगभग सौ फिल्में देख डालीं इनमे से एक थी विट्टोरियो डी सीका की महान फ़िल्मबाइसाइकिल थीव्ज़जिससे राय  खासे प्रभावित हुए। जलमार्ग से भारत लौटने के दौरान ही उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'पाथेर पांचाली' की पटकथा लिखना आरम्भ कर दिया था। 

१९५२ में भारत के पहले अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव का आयोजन हुआ जिसमें उन्होंने विश्व के कई देशों की फिल्में देखीं। फिल्मों की तार्किक यथार्थवादी वर्णन शैली ने उन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। उन्होंने कहीं से भी फ़िल्में बनाने की ट्रेनिंग नहीं ली थी, बल्कि अमेरिकी फ़िल्में बार-बार देखकर ही बहुत कुछ सीख लिया था और जो बातें फ़िल्में नहीं सिखा पाईं वे उन्होंने काम के दौरान सीखीं।

अंततः राय ने विभूतिभूषण बनर्जी  के उपन्यास "पथेर पांचाली" पर आधारित अपनी पहली फिल्म बनाने का निर्णय लिया लेकिन एक नये फिल्मकार पर पैसे लगाने को कोई तैयार नहीं था तो उन्होंने स्वयं ही अपनी जमा पूँजी लगा कर आठ नए कलाकारों की एक टीम बनायी और फिल्म पर काम शुरू कर दिया लेकिन जल्द ही आवश्यकतानुसार धन जुटा पाने के कारण फिल्म को रोकना पड़ा। राय  ने कुछ लोगों से मदद लेने की कोशिश की लेकिन वे फिल्म में अपने हिसाब से कुछ बदलाव चाहते थे जिसके लिए राय तैयार नहीं थे। अंततः तीन वर्ष बाद पश्चिम बंगाल सरकार की वित्तीय सहायता से 'पाथेर पांचाली' बनकर तैयार हुई और १९५५ में प्रदर्शित हुई और बहुत लोकप्रिय हुई। इस फिल्म को कान फिल्मोत्सव में 'सर्वश्रेष्ठ मानवीय प्रलेख' के ख़िताब से नवाज़ा गया।

राय की अगली फिल्म अपराजितो की सफलता ने इन्हे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक विशेष पहचान दिलाई। इसके बाद तीन दशक से भी लंबे समय के दौरान सत्यजीत राय  ने करीब तीन दर्जन फिल्मों का निर्देशन किया. इनमें अपूर संसार, जलसा घर, पारस पत्थर, कंचनजंघा, महापुरुष, महानगर, चारूलता जैसी फिल्में शामिल हैं. १९७७ में उनकी एकमात्र हिंदी फिल्म शतरंज के खिलाड़ी आई. १९९१ में प्रदर्शित आगंतुक सत्यजीत रे के फ़िल्मी करियर की अंतिम फिल्म थी.

फिल्म जगत में अतुलनीय योगदान के लिए सत्यजीत राय को कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। भारत सरकार की ओर से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में विभिन्न विधाओं के लिए उन्हें ३२ राष्ट्रीय पुरस्कार मिले जिनमें बार उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार दिया गया था। १९५८ में  पद्म श्री, १९६५ में पद्म भूषण, १९६७ में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार,  १९७६ में पद्म विभूषण, १९८५ में हिंदी फिल्म उद्योग का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार और १९९२ में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। सत्यजीत राय चार्ली चैपलिन के बाद दूसरे फिल्मकार थे जिन्हें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। वे अकेले भारतीय हैं जिसे ऑस्कर (ऑनरेरी अवॉर्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट) दिया गया।
२३ अप्रैल १९९२ को भारतीय फिल्म जगत के इस पुरोधा ने अंतिम सांस ली और इस संसार को हमेशा के लिए विदा कह गया। 

महान जापानी फ़िल्मकार अकिरा कुरोसावा ने राय के बारे में कहा थाराय का सिनेमा देखना इस संसार में सूर्य और चन्द्रमा को देखे बिना रहने के समान है।

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