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कविता - 'माँ की मुस्कुराहट' (Poem: Maa Ki Muskurahat)

माँ, बहुत कम देखा है मैंने तुझे खुलकर मुस्कुराते हुए 
बिना शिक़ायत सुबह जल्दी उठ जाते हुए और देर रात सबको सुलाते हुए
दिन भर चूल्हे की आग में रोटी सा सिकते हुये
और फिर रात में अगली सुबह का इंतज़ार करते हुए
देखा है तुझे अक्सर खाली  डब्बों में चंद सिक्के छिपाते हुए
और फिर उन सिक्कों को जोड़-जोड़ मेरी मुस्कुराहटों पे  लुटाते हुए 
मेरी स्कूल की मैली  यूनिफॉर्म को अपने हाथों से रगड़ते हुए 
और फिर अक्सर मेरी फ़ीस को लेकर पापा  से झगड़ते  हुए
हाँ, बहुत कम देखा है मैंने तुझे खुलकर मुस्कुराते हुए 
माँ वो तू ही तो है जो जाने कितनी ही बार मरती है मेरे हौंसलों  को ज़िंदा  रखने  के  लिए
मुझे रोता  देख मुझे बाँहों में कसने के लिए
हाँ माँ, मैंने तुझको देखा है अक्सर खाली कनस्तर में कुछ टटोलते हुए 
अक्सर दुकानों पर  लाला से अनाज का दाम मोलते हुए 
सबने सुना होगा फ़रिश्तों को पर मैंने देखा है तुझे बहुत कम बोलते हुए 
अपने आँचल में जो तूने बिंदी के लिए ५ रुपये बचाये थे 
देखा है तुझको ज़रूरत पर उस गांठ को भी खोलते हुए 
और...और...और 
मैं भूखा न सोऊँ कभी तो तू लगती है राशन की लम्बी कतारों  में  
तुझे कभी खो बैठूं तो ढूंढूंगा इन चाँद सितारों में   
थोड़ी लजाई सी, थोड़ी घबराई सी और थोड़ा गुस्साई सी 
और फिर धूप में झुलसी सी, जाड़े में ठिठुरी सी और बरसात में भीगी सी 
माँ मैंने तुझको देखा है फटे आँचल को हाथों में छिपाकर चलते हुए 
मुश्किल वक़्त में गिरते और अक्सर संभलते  हुए
हाँ माँ, मैंने बहुत कम देखा है तुझे  खुलकर मुस्कुराते हुए 
माँ, मैंने बहुत कम देखा है तुझे खुलकर मुस्कुराते हुए ।

- मनीष विश्वास 


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