"पूजता हूँ कभी बुत को कभी पढ़ता हूँ नमाज़, मेरा मज़हब कोई हिन्दू न मुसलमाँ समझा"
कुछ रोज़ से ये नुक्कड़ का फ़क़ीर दिखाई नहीं दिया, जाने कहाँ चला गया है ! वैसे पहले मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि वो है भी या नहीं भला हमारी ज़िन्दगी में तक़लीफ़ें कम हैं जो हम किसी और का पूछने चलें ? जिए या मरे हमें क्या। खाये या भूखा रहे किसको फ़र्क़ पड़ता है ? हमें भी तो अपनी ज़िन्दगी देखनी है, ऐसे फ़क़ीर जाने कितने हैं। संजू जब स्कूल से लौटता है तो मेरी पत्नी संध्या उसे लेने बस स्टॉप पर जाती है। उस दिन जब संध्या बस स्टॉप तक पहुँचने में लेट हो गई तो उस फ़क़ीर ने संजू को घर तक छोड़ दिआ। संध्या तो उस दिन डर ही गई थी, जाने कैसे फटे-पुराने कपड़े पहना था। सुना है ऐसे लोग बड़े चोर होते हैं। मैंने भी संध्या की लापरवाही पे खूब डाँट लगा दी थी। धीरे-धीरे उस फ़क़ीर को देखने की आदत सी हो गई। यहीं मेरे घर से बीस क़दम दूर ही तो है नुक्कड़ जहाँ पीपल के तले दिख जाता था अक्सर। ऑफिस से आते-जाते अकसर देखता था मैं उसे। उस दिन सुबह-सुबह मुझे देख कर मुस्कुरा दिया, मानो बरसों से जानता हो मुझे। थोड़ा अजीब लगा था मुझे पर दफ़्तर में वो दिन अच्छा बीता। पूरे दिन उसका हँसता हुआ चेहरा ही ध्यान आता रहा था। शाम को लौटते हुए उसे देखकर मैं भी मुस्कुरा दिया था।
भला मानस था बेचारा। ऐसा सिर्फ
मैं नहीं कहता, सब कहने लगे थे। शाम को कभी-कभी क़ुरान की आयतें गुनगुनाता तो कभी
राम-चरित-मानस का पाठ करने लगता। ऐसे मौकों पर उसके इर्द-गिर्द भीड़ लग जाती। इस भीड़
में कुछ बच्चे होते और कुछ होते मज़हब के जानकार। पर वो बस गुनगुनाता रहता। वैसे हमारे मोहल्ले वाले भी कम दिलदार नहीं हैं
| वो चतुर्वेदी जी, वो हिन्दू-सभा वाले, उन्होंने तो उसको तन ढकने के लिए एक केसरी
कपड़ा भी दिआ था। बस एक छोटी शर्त रख दी कि अब से वो सिर्फ़ राम चरित मानस का ही पाठ करेगा।
पर दो दिन बाद वो पड़ोस के मोहल्ले
से मौलाना साहब भी देखने चले आये थे | चार गज़ फ़ालतू हरा साफा और तन ढकने को कपड़ा देते
हुए बोले "तुम लाजवाब हो, मुँहज़बानी सारी आयतें याद हैं | वाह! क्या बात है |
आज से तुम्हारे रहने और खाने का खर्च हमारा, बस क़ुरान दोहराते रहना।
लगता था मोहल्ले वाले भी उसको अपना चुके थे। रोटी-पानी दे जाया करते थे। मैं भी संजू के साथ जाके कभी एक-आधा फल दे आया करता था। बड़े प्यार से हाथ फेर देता था संजू के सर पे। उस दिन मैंने पूछ भी लिया अरे बाबा हो क्या ? हैरानी से देखने लगा था मुझे। मुझे लगा समझ नहीं आया इसलिए मैंने दोबारा पूछ लिया "अरे मज़हब क्या है? हिन्दू या मुसलमान?" हँसने लगा। मुझे तो पागल लगा एकदम से। आसमान की तरफ देखते हुए बोला "इंसान हूँ।" सोचा कह दूँ "इंसान नहीं, पागल हो। हर इंसान का कोई न कोई मज़हब तो होता ही है।" फिर सोचा रहने देता हूँ। ये छोटा आदमी है, सोच भी छोटी ही होगी।
पर ये पिछले हफ्ते से माहौल
थोड़ा ख़राब सा हो गया है। कुछ दंगो जैसी खबरें भी आ रहीं हैं। मीडिया में भी हर वक़्त
यही चलता रहता है। उस दिन मोहल्ले के इसी नुक्कड़ पे बहस भी हो गई थी दो गुटों में। वो तो
भला हो फ़क़ीर का जो हाथ जोड़ के बीच-बचाव करने
लगा था पर अब भी माहौल नाज़ुक है तभी तो वो हिन्दू-सभा वाले धमका गए थे फ़क़ीर को। "राम-चरित के अलावा कुछ दोहराया तो हर्ज़ाना
भुगतना पड़ेगा।"
कोई तो ये भी कह रहा था कि वो
पड़ोसी मोहल्ले के कुछ लोग आये थे मौलाना साहब के साथ | साफ़ा छीन के ले गए | कहा "मज़हब
गन्दा कर दिया।" दो थप्पड़ भी मारे और जाते-जाते
कह गए "देख लेंगे तुझे तो"
उसी दिन से जाने कहाँ गायब है। चला गया होगा कहीं या फिर....
इंसानो के बनाये मुआशरे में भला बेमज़हबी इंसान का क्या काम ! राम-रहीम एक हो जाएँ ये मुमकिन नहीं शायद ! मैंने कहा था न बिना मज़हब के इंसान की क्या पहचान।
- मनीष विश्वास
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