Skip to main content

मन्ना डे: कानों में गूंजती एक सुरीली आवाज़ (Manna Dey)

मन्ना डे और संगीत का रिश्ता बहुत गहरा है।  आज वो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज़ आज भी हमारे कानो में गूंजती है उनके गाये हुए अनमोल नगीने आज भी हमारे दिलों में बसते हैं। 


मन्ना डे भारतीय फिल्मी संगीत जगत का वह सूरज जिसकी आवाज़ की रोशनी में छोटे-बड़े कई फ़िल्मी सितारे जगमगाये। फ़िल्मी संगीत जगत में उनके योगदान को आंकना सूरज को रोशनी दिखने जैसा है। कई बड़े फ़िल्मी गायक आज भी उनकी गायिकी से प्रेरणा लेते हैं। मन्ना डे ने अपने लम्बे करियर में 3000  से भी ज़्यादा गानों का अद्वितीय रिकॉर्ड बनाया। आइये सुनते हैं इन्ही अनमोल नगीनो में से एक...

1 मई 1919, एक तारीख जो इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गयी क्यूंकि इसी दिन सुप्रसिद्ध शहर कलकत्ता को मन्ना डे के जन्म से धन्य होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । मन्ना डे का वास्तविक नाम था प्रबोध चंद्र डे।  उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा इन्दु बाबुर पाठशाला से पूरी की और फिर स्कॉटिश चर्च कॉलेज में प्रवेश लिया और स्नातक किया उन्होंने विद्यासागर कॉलेज से । स्कॉटिश कॉलेज में उन्होंने संगीत प्रतियोगिता तीन वर्ष लगातार जीती तो आयोजकों ने उन्हें चाँदी का तानपुरा देकर कहा कि वे आगे से प्रतियोगिता में भाग न लें। कॉलेज के दिनों में मन्ना डे कुश्ती और मुक्केबाजी और फुटबॉल में खासी रूचि लेते थे। उनके पिता चाहते थे कि वे वकील बनें लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था... कैसे मन्ना डे उतारते चले गए संगीत के क्षेत्र में ये भी जानेंगे उससे पहले सुनते हैं एक बेहतरीन गीत। 

अपने चाचा कृष्ण चंद्र डे से ही प्रभित होकर मन्ना डे ने संगीत के क्षेत्र में उतरने का निर्णय लिया। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा अपने चाचा से ही हासिल की। उनके बचपन के दिनों का एक दिलचस्प वाकया है। उस्ताद बादल खान और मन्ना डे के चाचा एक बार साथ-साथ रियाज कर रहे थे। तभी बादल खान ने मन्ना डे की आवाज सुनी और उनके चाचा से पूछा - "यह कौन गा रहा है?" जब मन्ना डे को बुलाया गया तो उन्होंने उस्ताद से कहा -"बस ऐसे ही गा लेता हूँ।" लेकिन बादल खान ने मन्ना डे की छिपी प्रतिभा को पहचान लिया। इसके बाद वह अपने चाचा से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मन्ना डे 40 के दशक में अपने चाचा के साथ संगीत के क्षेत्र में अपने सपनों को साकार करने के लिये मुंबई आ गये और फिर यहीं के होकर रह गये।

उन्होंने सन् 1942 में फ़िल्म तमन्ना से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत की जिसके गीतों को संगीत से सजाया था कॄष्णचंद्र डे ने और इस गाने में साथ थीं सुरैया जी। हालांकि इससे पहले वह फिल्म रामराज्य में कोरस के रूप में गा चुके थे। दिलचस्प बात है कि यही एक एकमात्र फिल्म थी, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था। उसके बाद मन्ना डे को प्रसिद्ध संगीतकार एस. डी. बर्मन के साथ भी काम करने का मौका मिला। बर्मन के संगीत निर्देशन में मन्ना डे ने 'ऊपर गगन विशाल' फिल्म मशाल के लिए गाया जो हिट रहा और मन्ना डे के लिए नई राहें खुल गयीं । उन्होंने 1942 से 2013 तक कई कालजयी गीतों को अपनी आवाज दी। हिन्दी और बंगाली फिल्मी गानों के अलावा उन्होंने कुछ अन्य भारतीय भाषाओं में भी गीत गाये। 

मन्ना डे केवल शब्दों को ही नहीं गाते थे, बल्कि अपने गायन से शब्द के पीछे छिपे भाव को भी खूबसूरती से सामने लाते थे। शायद यही कारण है कि प्रसिद्ध हिन्दी कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर कृति मधुशाला को स्वर देने के लिये मन्ना डे का चयन किया। सन् 1961 में संगीत निर्देशक सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में फिल्म काबुलीवाला की सफलता के बाद मन्ना डे शोहरत की बुलन्दियों पर जा पहुँचे थे। आवारा में उनके द्वारा गया गीत "तेरे बिना चाँद ये चाँदनी!" बेहद लोकप्रिय हुआ। इसके बाद उन्हें बड़े बैनर की फिल्मों में अवसर मिलने लगे। "प्यार हुआ इकरार हुआ" (श्री 420), "ये रात भीगी-भीगी" (चोरी-चोरी), "जहाँ मैं जाती हूँ वहीं चले आते हो" (चोरी-चोरी), "मुड़-मुड़ के ना देख मुड़-मुड़ के!" (श्री 420) जैसे अनेक सफल गीतों में उन्होंने अपनी आवाज दी। काबुलीवाला के गाने 'ऐ मेरे प्यारे वतन' से तो मन्ना डे ने लोकप्रियता की बुलंदियों को छू लिया। क्लासिकल नंबर्स गाने में मन्ना डे का मुकाबला फिल्म इंडस्ट्री का कोई गायक नहीं कर सकता था। जब भी कोई कठिन गीत होता था, संगीतकार मन्ना डे को ही याद करते थे।

18 दिसम्बर 1953 को केरल की सुलोचना कुमारन से उनकी शादी हुई। उनकी दो बेटियाँ हैं: शुरोमा और सुमिता। उनकी पत्नी सुलोचना कैंसर से पीड़ित थी, जो 2012 में इसी बीमारी की वजह से स्वर्ग सिधार गयीं । अपने जीवन के पचास वर्ष से ज्यादा मुम्बई में व्यतीत करने के बाद मन्ना डे अन्तत: कल्याण नगर बंगलोर में जा बसे। इसी शहर में उन्होंने अन्तिम साँस ली। भारत सरकार ने उन्हें 1971 में पद्म श्री, 2005 में पद्म भूषण एवं 2007 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।

Comments

Popular posts from this blog

कोरोना के लक्षण दिखाई दें तो क्या करें? What to do if you have symptoms of corona virus (In Hindi)?

Corona के लक्षण पहचानिये:  कोरोना के मरीज़ों में अलग-अलग तरह के लक्षण दिखाई दे सकते हैं - हल्के लक्षणों से लेकर गंभीर बीमारी तक। वायरस के संपर्क में आने के 2-14 दिन बाद तक लक्षण दिखाई दे सकते हैं। अगर ये लक्षण दिखाई दें तो कोरोना हो सकता है: • बुखार या ठंड लगना • सूखी खांसी • सांस लेने में कठिनाई • थकान व मांसपेशियों या शरीर में दर्द • सरदर्द • स्वाद या गंध महसूस न कर पाना • गले में ख़राश • सीने में कसावट या बहती नाक • उलटी अथवा मितली • दस्त हालाँकि इस सूची में सभी संभावित लक्षण शामिल नहीं हैं। नए लक्षण मिलने पर सम्बंधित सरकारी विभाग इस सूची को update करते जा रहे हैं। अस्वस्थ महसूस करने पर क्या करें ? १. सबसे पहले अपने डॉक्टर से अपने लक्षणों के बारे में बात करें और अगर डॉक्टर सलाह दे तो तुरंत कोरोना जाँच कराएं। २. चिकित्सकीय परामर्श लेने के अलावा किसी भी काम से घर से बाहर न निकलें। ३. कोरोना से संक्रमित अधिकांश लोगों को हल्की बीमारी होती है और वे बिना चिकित्सा देखभाल के घर पर ठीक हो सकते हैं। अगर मामूली तौर पर बीमार हैं तो घर ...

जीवन शैली में छोटे बदलावों के बड़े और सकारात्मक प्रभाव (Positive effects of few small changes in our lifestyle)

हमारा आशियाना , जहां हम रहते हैं अपने अपनों के साथ , दिन भर के काम की थकान के बाद जहाँ आकर हमें सबसे ज़्यादा सुकून मिलता है , जहां पर बिताया हर पल हमारे मन के खली बक्से को खूबसूरत यादों से भर देता है , जिसमे रहने वालों से होता है हमें सबसे ज़्यादा प्यार और जिससे दूर रहने पर रहते हैं हम हर दम बेक़रार। ऐसे आशियाने को हम किसी की नज़र नहीं लगने देता चाहते और चाहते हैं कि हमारा आशियाना हमेशा खुशयों से भरा रहे और इसके लिए हमें सिर्फ इतना सुनिश्चित करना है कि हमारे आशियाने में रहने वाला हर एक सदस्य प्रसन्नचित्त रहे , स्वस्थ रहे। अगर सभी सदस्य healthy & happy होंगे तो हमारे घर का माहौल तो खुद-ब-खुद  खुशनुमा हो जायेगा। इसके लिए हमें अपने जीवन में कुछ बदलाव लाने होंगे। आइये, ऐसे ही कुछ छोटे-छोटे बदलावों के बारे में बात करते हैं जो देखने-सुनने में शायद छोटे लगें पर हमारे जीवन पर बहुत बड़े और सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।   दिन की शुरुआत :  सकारात्मक बदलावों के बारे में चर्चा की शुरुआत करते हैं दिन के दिन के पहले काम यानि कि सुबह उठने से। एक दिन में सिर्फ २४ घंटे ही ...

मैं और मेरी अंग्रेजी

मैं और मेरी तन्हाई अक़्सर ये बातें करते हैं कि तुम होतीं तो ऐसा होता, तुम होतीं तो वैसा होता।  लता जी और अमिताभ जी की आवाज़ में गाये हुए एक मशहूर गीत की पंक्तियाँ हैं ये। कुछ दिनों पहले ये पंक्तियाँ मेरे कानों में पड़ीं तो अनायास ही इन पंक्तियों के भावार्थ ने मेरा वो अतीत याद दिला दिया जब मैं हिंदी माध्यम का मेधावी छात्र हुआ करता था (कृपा करके इस बात की पुष्टि के लिए मेरे विद्यालय न जाएँ) और ऊपर से हिंदी भाषा का कट्टर समर्थक पर अंदर ही अंदर अंग्रेजी बोलने और सीखने की इच्छा से ओत-प्रोत। उस समय मैं और मेरी तन्हाई अक़्सर ये बातें करते थे कि काश मैं भी कॉन्वेंट में पढ़ा होता; काश मैं भी फर्राटेदार अंग्रेजी बोल सकता; मैं भी ईंट का जवाब पत्थर से न सही पर अंग्रेजी का जवाब अंग्रेजी में तो दे पता। काश जब भी मुझे अंग्रेजी बोलना होता तो मुझे On लगेगा या Over, So लगाऊँ या Therefore; have been क्यों had been क्यों नहीं जैसे यक्ष प्रश्नों से गुज़रना न पड़ता पर वास्तव में मैं ये बात तन्हाइयों से ही कर पाता था क्योंकि मेरी सुनने वाला और था ही कौन? अपने क्लास में शायद सभी अंधे थे ...