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कहानी - 'किरदार' (Short Story - 'Kirdaar')


बकौल मियां जी "अफ़साना के जन्नत नशीं होने के बाद अब जी नहीं लगता।" और कोई उनका हमउम्र दोस्त हैरत से अगर मियां जी से पूछ बैठे "जी नहीं लगता मतलब?" तो बस कहने लगते हैं "जी नहीं लगता मतलब, यहाँ इस घर में, हर कोना कुछ खाली सा महसूस होता है। पूरी दुनिया खाली सी मालूम होती है।"

आज अफ्शा बेगम का इंतक़ाल हुए पूरा महीना गुज़र गया मगर मियां जी खाना तो दूर ठीक से पानी भी नहीं पीते। यहीं कमरे में पड़े रहते हैं। उनकी बेगम ख़ुशक़िस्मत रहीं होंगी जो शौहर की गोद में आख़िरी साँस भरी। बड़ी ख़ुश मिजाज़ थीं, हरदिल अज़ीज़। कभी कोई शिकायत नहीं, न किसी का बुरा चाहा। हमेशा मियां जी की ख़िदमत करती रहीं। मियां जी को किसी ने कभी रोते न देखा होगा मगर उस दिन फूट फूट के रो पड़े। मानो देखने वाले का कलेजा ही निकल जाये।
वैसे तो मियां जी ६० के पार हैं। बालों पर ख़िजाब का शौक बड़ा था मगर अब इन सब कामों में भी दिल नहीं लगता। अक़्सर पान से सुर्ख़ लाल होंठ अब सूखे पत्तो से मुरझाये रहते हैं और अफ्शा बेगम के जाने के बाद मायूस चेहरे पर झुर्रियों ने अपना घर सा बना लिया हो जैसे। हों भी क्यों न, वक़्त कम भी कहाँ गुज़रा था साथ साथ। २८ के थे जब ब्याह के लाये थे और अफ्शा, वो रही होंगी कुछ १८ बरस की। वैसे फ़ासला सिर्फ उम्र का होता तो बात कुछ और थी, चलते वक़्त में १८ को २८ पहुँचने में देर कहाँ लगती है। मगर मियां जी को ये बात बड़ी नागवार गुज़री थी कि उनकी शादी एक कम पढ़ी-लिखी और ज़ाहिर है कम पढ़ी-लिखी का मतलब शायद कम अक़्ल भी समझा होगा उन्होंने; से कराइ जा रही थी। वैसे मियां जी ने पुरज़ोर कोशिश भी की थी कि अफ्शा से उनका निकाह टूट जाये पर अब्बा के सामने उनकी एक न चली। मियां जी को यही लगा था कि वो ठहरे मॉडर्न ख़यालात पसंद और अफ्शा उसको भला चूल्हे चौके के अलावा कुछ आता भी होगा? सो पहली रात ही अपना बिस्तर समेटते हुए बोले "ग़ौर से सुनो तुम्हारा मेरा कोई मुक़ाबला नहीं। इस निकाह को मैं ज़रा भी नहीं मानता।"

अफ़साना बेगम को पहले पहल यही लगा कि मियां जी दिल्लगी किये जाते हैं। घूँघट में दबी ज़बान से कहने लगी "डरे को और क्या डराते हो।" पर फिर जब कुछ देर कोई हलचल न हुई तो खुद घूँघट को इंच-इंच खिसका के झाँकने लगी। देखा तो मियां जी गायब। कुछ पल मियां जी के इंतज़ार में बीते और फिर रात। दो रात जब यूँ ही बीत गयीं तो तीसरे दिन मियां जी पैर पकड़ कर रोने लगी "कोई गलती हुई हो तो सज़ा दीजिये पर यूँ ......" कहते कहते रोने लगी।" मियां जी टस से मस न हुए। "अब्बा का ख़याल न होता तो...... " जाने क्या कहते कहते रुक गए मियां जी। और अफ्शा पूरे दिन मियां जी की अधूरी बात को अपने ज़हन में पूरा करने की कोशिश करती रही। "अब्बा का ख़याल न होता तो शायद मियां जी घर से निकाल देते? या फिर मार देते? या जाने फिर क्या करते?"

साल भर में अफसाना २ बार मायके भी हो आई थीं मगर किसी से कुछ न कहा। सहेलियां अठखेलियां करती तो सिर्फ ये कहती मियां जी बड़े ज़हीन हैं, कम बात करते हैं। और जब कोई पूछता की मियां जी को साथ क्यू न लाई तो कहती " मन तो बड़ा था उनका पर काम के सिलसिले में बाहर जाना पड़ा, मसरूफ़ थे।" और जब कोई मायके वाला कहता "अगली दफा लेती आना दामाद को" तो झिझकते हुए कहती "हाँ हाँ लेती आउंगी।"

वक़्त यूँ ही पहिये पे दौड़ता रहा। न मियां जी ने अफ्शा को कभी छुआ न कभी इज़्ज़त से बात की। जब मियां जी के अब्बा ने दोनों को साथ घूमने जाने की हिमायत की तो मियां जी ने काम का बहाना कर दिया। लेकिन जब अब्बा न माने तो मियां जी अफ्शा के साथ जाने को तो राज़ी हुए पर उस रात उन्होंने अफ्शा से साफ़ लफ़्ज़ों में कहा "तुम बेगम नहीं बेगम का सिर्फ एक किरदार हो।"

बस वो दिन था और बेगम ने किरदार में कोई कमी न रखी। सोते, उठते, बैठते इस किरदार को ही अपना फ़लसफ़ा समझा और मियां जी की ख़िदमत में कोई कमी न की। सालों से औलाद न होने का इलज़ाम भी खुद पर लिया पर कभी शिकायत न की। जाने किस मिट्टी की बनी थीं।
निकाह के बाद मियां जी के इश्क़ की गर्म सुगबुगाहट अफ्शा बेगम तक पहुंची ज़रूर लेकिन वो भी उनके किरदार को जला न पायी। न कभी कोई सवाल किआ न जवाब की ही चाहत रखी। बस मियां जी की बेगम का किरदार निभाती रहीं। अब्बा जी के इंतक़ाल के बाद कुछ रोज़ बेचैन ज़रूर रहीं कि मियां जी कहीं निकाल न दें लेकिन शायद मियां जी इतने बुरे भी न थे या फिर जाने मियां जी को लगा होगा कि मुफ्त की नौकरानी है।
निकाह को १५ बरस बीत गए। मियां जी का दिल पसरा हुआ हो शायद पर अफ्शा बेगम संगमरमर दिल बनती चली गईं। उन्हें याद रहा तो सिर्फ अपना किरदार। इन बरसों में घर के काम के अलावा अफ्शा बेगम को अपने मायके ख़त लिखने का ही काम बचा था। वो हर ख़त में लिखती "मैं भली हूँ। मियां जी बड़ा ख्याल रखते हैं। आप सब की अफ्शा।" इसका इल्म मियां जी को उनकी डायरी में रखे पुराने ख़तों से हुआ। लिखा था "सुनकर अच्छा लगा तुम भली हो और मियां जी तुम्हारा बड़ा ख्याल रखते हैं। यूँ ही ख़त लिखती रहना।"

जवानी और अब्बा जी के जाने के बाद इलाके में जब रसूख़ थोड़ा कम हुआ तो मियां जी को अफ्शा बेगम का ख़याल सा हुआ। पूछना भी चाहा पर हिम्मत न हुई। लगा जैसे किस मुँह से कुछ कहें। धीरे धीरे मियां जी के दिल में अफ्शा बेगम के लिए इज़्ज़त बढ़ती चली गई और जो एहसान कभी वो खुद का माना करते उनपर आज उनके एहसान तले दबे मरे जाते हैं। मियां जी की इज़्ज़त बाहर भले ही कम हुई हो मगर अफ्शा बेगम ने कभी उन्हें इसकी भनक तक न लगने दी। मरते दम तक बेगम अपने किरदार में ही जीती रहीं |

यहीं महीने भर पहले अफ्शा बेगम ये कहते कहते दम तोड़ गईं कि "उम्मीदतन मैंने अपना किरदार निभाया। मियां जी, अब आपकी बारी।"

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