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कहानी - 'बीमारी' (Short Story: Beemari)

मोटर गाड़ी की गड़गड़हट से सुबह की ख़ामोशी में आज फिर ख़लल पड़ा। ऐसा अक्सर होता है। धनंजय बाबू काम के सिलसिले में ज़्यादातर घर के बाहर ही रहते हैं । कभी महीने के २० दिन तो कभी पूरा महीना। और इस बार तो महीने भर से भी ज़्यादा हुआ होगा। कारोबार भी तो फैला हुआ है। क्या करते हैं ? अजी एक काम हो तो बताऊँ। और रुपया-पैसा ? हम जैसों की गणित से ज़्यादा ही होगा। बस एक ही चिंता है.... बीबी जी की बीमारी।


घर में दाख़िल होते ही धनंजय बाबू ने सबसे पहला सवाल भी यही किया "प्रतिमा कैसी है ?" 
जवाब मिला "जी वैसी ही, साहब कोई दूसरा डाक्टर ..."नौकरानी ने हिचकिचाते हुए कहा। 
चाय का प्याला सुड़कते हुए धनंजय बाबू ने कहा " हम्म्म देखता हूँ "

इस बात को ६ महीने हो चुके हैं, बात भी एकदम आम हो चुकी है। जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं। पहले-पहल तो सब रिश्ते-नातेदार दौड़ पड़ते थे एकदम से। हाल-चाल लेने वाले भी रोज़ उमड़ आते थे। जाने क्या हो गया है ? ये किस बीमारी ने जकड़ लिया है प्रतिमा को !! न मुस्कुराती है, न कुछ कहती है। न रोती है, न कोई दर्द। न कोई वहम। दिन भर बेसुध पड़ी रहती है। न भूख न प्यास। जब तक कोई आके न कह दे कि बीबी जी, खाना ठंडा हो रहा है, मजाल है निवाला ख़ुद से मुँह में चला जाये। कुछ तो दबी ज़बान से कहने लगे हैं " ऊपरी हवा का चक्कर है " और वो नुक्कड़ की मुंहफट बुढ़िया ये कहने में भी नहीं हिचकती कि " बहुरिया तो ज़िंदा लाश है " 

वैसे ऐशो-आराम ख़ूब है। नौकर-चाकर की भी कोई कमी नहीं। एक को आवाज़ दी नहीं कि दो हाज़िर हो जाते हैं। पर क्या फ़ायदा। घर की रौनक ही प्रतिमा से थी। अब तो बग़ीचे के फूल भी मुरझाये से लगते हैं। ऐसा नहीं कि  धनंजय बाबू ने कोई इलाज में कसर छोड़ी हो। अजी कहाँ-कहाँ से वैद्य-डॉक्टर बुलवाये, क्या-क्या जतन किये। पानी की तरह पैसा बहाया। कभी दिल्ली से डॉक्टर चला आता है तो कभी बम्बई से। हवा-पानी भी बदल के देख लिआ, पर असर कुछ न हुआ। मानो दवा बनी ही न हो ऐसे किसी मर्ज़ की।

आज भले ही सारे शौक़ हवा हो गए हैं। मगर तीन बरस पहले प्रतिमा जब ब्याह करके कलकत्ता शहर में आयी थी तो हर १५ दिन में बाज़ार-हाट जाती थी। कभी नई जूतियाँ, कभी बिंदियाँ, कभी एक से एक महंगे कपड़े तो कभी गहने। धनंजय बाबू भी जान छिड़कते थे "अरे जो जी में आये ले लो, सारा हाट ख़रीद लो, जो है तुम्हारा ही तो है "
अच्छी गुज़र-बसर थी। घर का माहौल भी ख़ुशनुमा था। घर की रौनक ही औरत से होती है और वही बीमार पड़ जाये तो ... 

काफ़ी जतन किये  मगर सब बेकार। लोग तो पीठ पीछे बातें भी बहुत करते हैं  और ये नौकर !! इनका क्या है, ये तो बदज़ुबानी करते हैं। कुछ भी कहे देते हैं, कहीं भी कहे देते हैं। तभी तो कुछ रोज़ पहले नुक्कड़ की मुँहफट बुढ़िया से घर की नौकरानी कह रही थी "औलाद का सुख दादी , औलाद का सुख "
"हाँ सही कह रही है तू , बिना औलाद के घर खाने को दौड़ता होगा" बुढ़िया कहने लगी। और इन नौकरों के बीच ही बड़ी कानाफूसी है जो आये दिन मोहल्ले के ज़बान पे चढ़ी रहती है "अरे कुछ नहीं जोड़ी बेमेल है" मगर सच कहूँ तो मुझे ये सारी बातें कोरी बकवास भर लगती हैं। होगा उम्र का फ़र्क़ पर रुपयों ने दोनों के बीच का ये फासला ज़ाहिर कभी नहीं  होने दिया। रुपयों में गज़ब की ताकत होती है। झूठ है क्या ? आदमी की ढलती उम्र रोक दे। कम से कम धनंजय बाबू को देख कर तो यही ख़याल आता है। 

ख़ैर, चाय का प्याला ख़त्म होते-होते किसी नौकरानी ने आवाज़ दी "बीबी जी जाग गई हैं"
धनंजय बाबू जब दाख़िल हुए अंदर तो बेसुध पड़ी प्रतिमा में जैसे जान सी आ गई "आ गए ?" लड़खड़ाती आवाज़ में बोलने लगी। धनंजय बाबू ने जब पूछा "कैसी हो?" तो बिना जवाब दिए पूछने लगी "जाना कब है ? आज ही निकल जाओगे या कल तक रुकोगे ?" सवाल से बचते हुए धनंजय बाबू ने कहा "ठीक हो जाओ जल्दी से। कल एक नया डॉक्टर आएगा। बड़ा क़ाबिल है।" इतना कहते-कहते बाहर जाने लगे तो प्रतिमा ने बुदबुदाते हुए कुछ कहा "और वो कैसी है ?" धनंजय बाबू ने सुनके जैसे अनसुना कर दिया इस बात को | प्रतिमा भी बेसुध सी पड़ी रही जैसे उसे भी किसी जवाब की उम्मीद ही न हो। अब तो ६ महीने हो चुके हैं इस बात को। पहले-पहल झगड़े हुए थे। पर अब शायद उम्मीद ही न हो जैसे। नौकर भी दबी ज़बान से कहते हैं यहाँ। साहेब ने शादी कर ली है। दार्जिलिंग में, जहाँ महीने महीने भर रुकते हैं।  

शाम को जाते हुए धनंजय बाबू अपने एक मुलाज़िम से कहने लगे "कल एक नया डॉक्टर आएगा। उनकी फ़ीस और दवाओं में कमी न रहने पाए। इस बार मुझे आने में थोड़ा ज़्यादा वक़्त लगेगा, प्रतिमा का ध्यान रखना "
"आप चिंता न करें साहेब, इस बार बीबी जी बिलकुल ठीक हो जाएंगी। ठाकुर जी से प्रार्थना की है।"

फिर वही मोटर गाड़ी की गड़गड़ाहट। धनंजय बाबू निकल चुके थे और मोटर गाड़ी भी ढलती शाम के अँधेरे में गुम हो चुकी थी।

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